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Top 36 Love quotes about him 2020

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{वरदान का भय}

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भगवान श्रीकृष्ण द्वारिकापुरी के सिंहासन पर विराजमान थे। अनेक राजा उनकी कृपा पाने के लिए उन्हें घेरे बैठे थे। श्रीकृष्ण की कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। उनकी चतुराई और पराक्रम के आगे सभी राजा हार मान चुके थे। बचा था, बस दैत्य राज शकुनि।

दैत्यराज शकुनि बहुत ही शक्तिशाली राजा था। देवता भी उससे थर्राते थे। उसने शिव की तपस्या की थी। उनसे अजय होने का वर पाया था। शिवजी ने उसे वरदान दिया था कि शत्रु द्वारा मारे जाने पर जैसे ही उसका मृत शरीर पृथ्वी पर गिरेगा, वह पुन: जीवित हो उठेगा। आकाश में मृत्यु होने पर हवा के स्पर्श से भी वह जीवित हो उठेगा।



शकुनि कई युद्ध में मारा गया, मगर हर बार और ज्यादा शक्तिशाली होकर वह जीवित हुआ। भला ऐसा असुर  भगवान कृष्ण की राजसत्ता को कैसे सहन करता?



उसने द्वारिकापुरी पर आक्रमण कर दिया। उसके बेटे-पोतों की संख्या कम नहीं थी। सभी वीर थे। वे सेना लेकर यादव कुल पर टूट पड़े। मगर वे यादवों के सामने टिक न सके। एक-एक करके सारे मारे गए। यह देखकर शकुनि दैत्य तिलमिला गया। उसका क्रोध दावानल जैसा भयंकर था। उसने नए सिरे से सेना को तैयार किया। निर्णय लिया कि वह स्वयं जाकर यादव कुल का खात्मा करेगा।

श्रीकृष्ण को खबर मिली कि इस बार दैत्यराज शकुनि स्वयं युद्ध के लिए आ रहा है। वह विचार में डूब गए। यादवों के सेनापति ने कहा, “महाराज, आप चिंता न करें। हमारे हाथों से वह भी न बच पाएगा।”
श्रीकृष्ण ने कहा, “तुम उसकी शक्तियों को नहीं जानते। वह शिवजी से अजेय होने का वरदान पाए हुए है।” बताते हुए श्रीकृष्ण ने वरदान की पूरी बात बता दी। सुनकर सभी यादव चिंता में डूब गए।
“मगर मैंने भी उपाय सोच लिया है। मैं स्वयं उससे युद्ध करूंगा। उसी उपाय से वह मारा जा सकेगा।” श्रीकृष्ण बोले।
“कौन सा उपाय भगवन?” सेनापतियों ने पूछा।
श्रीकृष्ण बताने लगे, “वरदान देकर शिवजी ने कहा था, दैत्यराज, सृष्टि में कोई भी सदा जीवित नहीं रह सकता। परिवर्तन सृष्टि का मूल है। तुम ही बताओ, तुम अपने प्राणों की सुरक्षा कैसे चाहते हो?”
शकुनि ने कहा, “आप ही बताएं।”
शिव बोले, “यह तोता लो। इसी में तुम्हारे प्राण हैं। सागर में तरंगों के बीच एक द्वीप है। तुम वहीं इसे रखो। इसकी रक्षा शंखचूड़ नामक सात फनों वाला भयंकर सर्प करेगा।”
यह सुनकर शकुनि प्रसन्न हो गया। वह जानता था, शंखचूड़ जैसे विषधर के रहते कोई तोते को पा नहीं सकेगा।”
“अब क्या होगा?” यादवों ने पूछा।



“होगा क्या! शकुनि को मारना है, तो वह तोता लाना होगा। यह काम गरुड़ ही कर सकते हैं। मैं उन्हें बुलाता हूं।” कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने गरुड़ को याद किया। अपने विशाल पंखों के जोर से आंधी सी उठाते हुए गरुड़ तुरंत उपस्थित हो गया।



गरुड़ ने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया। फिर बुलाने का कारण पूछा। श्रीकृष्ण ने उस द्वीप का पता बताते हुए कहा, “तुम शंखचूड़ को डराकर किसी तरह तोते को ले आओ। याद रहे, शंखचूड़ भगवान शंकर का सेवक है। उसे मारना नहीं। इस बीच मैं शकुनि से युद्ध करूंगा।” जाते हुए गरुड़ के कान में श्रीकृष्ण ने यह भी बता दिया कि तोते को कहां लाना है। श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर गरुड़ तेज गति से द्वीप की ओर उड़ चला।



इसी बीच शकुनि सेना लेकर द्ववारिकापुरी की ओर जाने के लिए तैयार हो गया।  उसकी पत्नी मदालसा को अपशकुन होने लगे। उसने पति से कहा, “सुना है, श्रीकृष्ण स्वयं आपसे युद्ध करने आ रहे हैं। उनसे लड़ना आपके लिए ठीक नहीं। आप उनसे संधि कर लें।”

शकुनि ने क्रोध से कहा, “तुम क्या नहीं जानतीं, यादव कुल ने मेरे वंश का संहार किया है। मैं उनसे बदला लेकर ही रहूंगा। तुम जानती हो, शिव के वरदान से मेरे प्राण जिस तोते में हैं, उसे कोई खोज नहीं पाएगा। फिर कृष्ण मेरा क्या बिगाड़ लेगा?” कहते हुए शकुनि युद्ध के लिए चल पड़ा।
गरुड़ ने द्वीप पर पहुंचकर शंखचूड़ सर्प पर अपनी चोंच से प्रहार किया। शंखचूड़ अचानक हुए इस हमले से घबरा गया। वह जान बचाकर भागा। तभी मौका पाकर गरुड़ ने तोते के पिंजरे को चोंच में दबाया और आकाश में उड़ चला। उसने तोते को पिंजरे सहित समुद्र में डाल दिया।



युद्ध क्षेत्र में शकुनि और कृष्ण में भयंकर युद्ध छिड़ गया। श्रीकृष्ण ने एक शक्तिशाली बाण से दैत्य का सिर धड़ से अलग कर दिया। शकुनि के मस्तक ने जैसे ही धरती का स्पर्श किया, वह जीवित हो उठा। उसने श्रीकृष्ण पर अपनी गदा चलाई, मगर उसका वार बचाते हुए श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य बाण का प्रयोग किया। इस बाण ने शकुनि के मस्तक को पृथ्वी की जगह दूर समुद्र की लहरों में फेंक दिया। तोता भी समुद्र में डूब चुका था। तोते के मरते ही शकुनि का भी अंत हो गया।

यह देखकर सब भगवान कृष्ण की जय-जयकार कर उठे।
    (वायु पुराण)



Good story in hindi edition 2020




{मदारी और बंदर}








लिंपी बंदरिया और लंबू बंदर चंदू मदारी के साथ ही रहते थे। लिंपी और लंबू अपने करतब दिखाते और चंदू अपनी बातों से और डमरू बजाकर लोगों को रिझाता। उनका खेल इतना मशहूर था कि दूर-दूर से लोग देखने के लिए आया करते।



लिंपी और लंबू को चंदू बहुत प्यार करता और उनका ध्यान रखता था। कभी उसने उनको ना ही मारा-पीटा, ना ही कभी खेल दिखाने को मजबूर किया। इसलिए लिंपी और लंबू उसे बहुत चाहते थे, जब उनका एक छोटा सा, प्यारा सा बेटा हुआ, तो वह बहुत ख़ुश हुए, क्योंकि वह हरदम खेलता-कूदता रहता, इसलिए चंदू ने उसका नाम जंपी रख दिया था।



जंपी जब कुछ बड़ा हो गया, तो उसने भी सारे करतब बड़ी जल्दी से सीख लिए या यह मानो कि उसके करतब लिंपी और लंबू से कुछ बढ़कर ही थे। उसके खेल देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते।

जब लंबू और लिंपी कुछ बूढ़े होने लगे, तो चंदू उन्हें घर पर ही छोड़ देता और जंपी को खेल दिखाने के लिए ले जाता। उसका खेल देखकर जब लोग ताली बजाते, जंपी बहुत ख़ुश होता। कुछ लोग चंदू को पैसे दे देते और कुछ लोग जंपी को भी कुछ खाने-पीने की चीजें दे देते। उसे जब कोई दर्शक केला देता, तब वह बहुत ख़ुश होता। उसकी ख़ुशी देखकर चंदू मुसकरा उठता।
पर धीरे-धीरे जंपी को यह महसूस होने लगा कि उनके खेलों में चंदू का तो कोई योगदान है ही नहीं! चंदू तो सिर्फ कुछ बोलता रहता है और डमरू बजाता है। इसमें कौन सी बड़ी बात है भला? यह तो कोई भी कर सकता है।



एक बार जंपी ने इस बात का जिक्र अपने मम्मी-पापा से भी किया। उन्होंने उसे समझाया, “बेटा, तुम उम्र के उस दौर से गुजर रहे हो जब अपने अलावा कुछ भी नजर नहीं आता है। यदि चंदू खराब इनसान होता, तो क्या भला हमारी सेवा अब भी करता, जब हम उसके किसी काम के नहीं है? भले ही करतब तुम दिखाते हो, पर इन खेलों को दर्शक के आगे कैसे प्रस्तुत किया जाएगा, जैसी चीजें तो चंदू ही निश्चित करता है और वैसे भी हम भला इनसान के मन की बात कैसे समझ सकते हैं? उनसे वह क्या कहता है, यह भला तुम क्या जानो? जैसे चल रहा है, वैसे ही चलने दो!”



जंपी को लगा, उसके मम्मी-पापा पुराने जमाने के हैं, वे भला उसकी बात कैसे समझेंगे? उसने मन ही मन निश्चय किया कि

वह एक दिन चंदू के घर से भाग जाएगा और अकेला ही खेल
दिखाया करेगा।
चंदू ने तो वैसे भी ना ही कभी लिंपी या लंबू को बांधकर
रखा था, ना ही वह जंपी को बांधा करता था। जैसे ही जंपी को भरोसा हो गया कि चंदू और उसके मम्मी-पापा सो गए हैं, वह घर से
भाग निकला।
यह तो जंपी जानता ही था कि किस मैदान में चंदू खेल कराता है, वह दिन भर इधर घूमता रहा और शाम को उस मैदान में पहुंच गया। वहां पर खूब सारे बच्चे खेल रहे थे। वह उनके ठीक बीच में पहुंच गया और उसने अपने करतब दिखाने शुरू कर दिए।
जब बच्चे जंपी का खेल देखा करते थे, तो वह हरदम चंदू के साथ हुआ करता था, जिसकी वजह से उन्हें उससे डर नहीं लगता था, पर उसे अकेले देखकर बच्चे डर गए और इधर-उधर भागने लगे।
एक बच्चे के पास केला था। केला देखकर जंपी के मन में लालच आ गया और वह उसे लेने के लिए उस बच्चे के पास पहुंच गया। उसे लगा कि उसने करतब तो दिखा ही दिए हैं, अब वह केला तो ले ही सकता है!



यह देख बच्चे और ज्यादा डर गए। उनमें से जो बड़े बच्चे थे, उन्होंने दूसरे बच्चों से कुछ कहा। अब सब बच्चे मिलकर जंपी पर पत्थर फेंकने लगे। जंपी को यह देखकर बहुत हैरानी हुई कि जो बच्चे कल उसके खेल को इतने प्यार से देखा करते थे, वही उसे पत्थर मार रहे हैं! दर्द के मारे वह कराह उठा। ऐसे समय में उसे चंदू की बड़ी याद आ रही थी।



उधर चंदू दिनभर जंपी को ढूंढ़कर परेशान हो गया था। वह उसी मैदान के पास से जा रहा था। बच्चों के मुंह से “बंदर, भागो!” जैसे शब्द सुने, तो वह समझ गया कि जंपी आसपास है। उसने प्यार से वही आवाज निकाली, जो वह उसे बुलाने के लिए निकाला करता था। जंपी का भी अकेले खेल दिखाने का उत्साह ठंडा हो गया था। वह तुरंत चंदू के पास पहुंचने के लिए दौड़ने की कोशिश करने लगा। पर एक पत्थर ने उसके पैर को ज्यादा जख्मी कर दिया था। वह चल नहीं पा रहा था।



 तब तक चंदू दौड़ता हुआ उसके पास पहुंचा। उसे इस तरह से तड़पता देख वह उसे प्यार से उठाकर घर ले आया। उसकी दिन-रात सेवा करता रहा। उसे प्यार देता देख, जंपी को वह बात समझ में आई, जो उसे मम्मी-पापा के कहने पर नहीं आई थी। उसने चंदू को प्यार से गले लगा लिया।


Good story in hindi 



{तेनालीराम : चोर कौन?}






एक बार महाराज कृष्णदेव राय के दरबार में एक चित्रकार आया। उसके बनाए चित्र देख सब वाह-वाह कर उठे।

चित्रकार ने महाराज का चित्र बनाया। उसे देख महाराज बहुत खुश हुए। उसने महाराज से राजमहल का चित्र बनाने की आज्ञा भी ले ली। बेरोक-टोक वह हर जगह आने-जाने लगा। जल्दी ही महल का सुंदर चित्र तैयार हो गया।



महाराज को चित्र देकर चित्रकार ने वापस जाने की आज्ञा मांगी। महाराज ने कहा, “जाने से पहले हम तुम्हारा सम्मान करना चाहते हैं। इसलिए एक-दो दिन और रुक जाओ।”

सम्मान से एक दिन पहले पता चला कि चित्रकार का सामान चोरी हो गया है। अगले दिन सेनापति ने महाराज को बताया कि सामान मिल गया है।



महाराज ने पूछा, “सामान कहां है? चोर कौन है?”

“महाराज, यह बात तेनालीराम ही बताएंगे।” सेनापति ने जवाब दिया। महाराज ने आश्चर्य से तेनालीराम की ओर देखा।
तेनालीराम हाथ जोड़कर बोला, “महाराज, सामान यह है। दोषी मैं हूं।”
दरबार में खुसुर-फुसुर होने लगी, ‘तेनालीराम ने अतिथि का अपमान किया है।’
तब तेनालीराम बोला, “महाराज, यह चित्रकार नहीं, शत्रु का जासूस है। महल का चित्र बनाते-बनाते इसने सभी गुप्त रास्तों का नक्शा भी बना लिया है। मुझे इस पर संदेह था, इसीलिए मैंने इसका सामान उठवा लिया। आपसे सम्मान प्राप्त कर यह तो यहां से चला जाता, साथ में हमारे महत्वपूर्ण भेद भी शत्रु के पास चले जाते।”
महाराज ने चित्रकार को कारागार में डलवा दिया। उसके स्थान पर तेनालीराम का सम्मान किया गया।’

     {सौ रुपए का नोट}





सयारा देर से सोई। देर से सोई, तो देर से उठी। देर से उठी, तो हर काम में देर होती चली गई। वह दौड़ते-दौड़ते स्कूल बस तक पहुंच गई। एक पल की और देरी हो जाती, तो बस छूट ही जाती। वह बस में चढ़ी ही थी कि रीमा बोली, “एक ही सीट बची है। आखिर वाली।” सयारा बस में सबसे पीछे वाली सीट पर बैठ गई।



स्कूल गेट आया। बस रुकी, बच्चे उतरने लगे। सयारा को सबसे बाद में उतरना था। अचानक उसकी नजर एक सीट के नीचे पड़ी। वहां सौ रुपए का एक नोट मुड़ा-तुड़ा पड़ा था। सयारा ने झट से वह नोट उठा लिया। उसने वह नोट मुट्ठी में बंद कर लिया। वह क्लास में आ पहुंची। पलक झपकते ही उसने नोट अपने स्कूल बैग में रख लिया।



सुबह स्कूल में प्रार्थना सभा हुई। अब पहला पीरियड गणित का था। सयारा का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था। वह सोच रही थी, ‘इंटरवल में कोल्ड ड्रिंक पिऊंगी। दो समोसे भी खाऊंगी। दो पैकेट चिप्स के भी लूंगी, तब भी रुपए बच ही जाएंगे।’ जैसे-तैसे पहला पीरियड बीता। दूसरा पीरियड हिंदी का था। लेकिन सयारा तो इंटरवल का इंतजार कर रही थी। वह सोचने लगी, ‘आज तो मजा आ गया। सौ रुपए तो बहुत ज्यादा होते हैं। मुझे दो-तीन दिन घर का टिफिन भी नहीं खाना पड़ेगा। काश! मुझे सौ रुपए हर रोज मिल जाते।



’तीसरा पीरियड भी बीत गया। चौथा पीरियड अंग्रेजी का था। सयारा सोचने लगी, ‘बस, अब कुछ ही देर में इंटरवल की घंटी बजने वाली है। आज तो भूख कुछ ज्यादा ही लग रही है।’

यह क्या, तभी शकीला रोने लगी। क्लास के सारे बच्चे उससे पूछने लगे। वह रोते-रोते बोली, “मेरा सौ रुपए का नोट खो गया।
पता नहीं, कब स्कर्ट की जेब से गिर गया। कहां गिरा, पता ही नहीं चला। स्कूल की छुट्टी के बाद मुझे अम्मी के लिए दवा लेकर जानी थी। अब्बू भी यहां नहीं हैं।”



अक्षरा ने कहा, “स्कूल में रुपए लाना मना है। तुम लाए ही क्यों?”

अंशिका ने कहा, “वह बता तो रही है कि अम्मी के लिए दवा ले जानी थी। अब क्या होगा?”
अंग्रेजी की टीचर गुरलीन कॉपियां जांच रही थीं। शकीला से पूछा, तो उसने सारा किस्सा सुनाया।
टीचर ने कहा, “छुट्टी होने पर मुझसे एक सौ रुपए ले जाना। अम्मी को बता देना। जब मन हो, मेरे रुपए लौटा देना।”
तभी इंटरवल की घंटी बजी। सयारा ने झट से अपना बैग उठा लिया। अचानक उसे न जाने क्या हुआ, वह टीचर से बोली, “मैम,
शायद यह एक सौ रुपए का नोट शकीला का ही है। मुझे मिला था, यह लीजिए।”



टीचर ने एक सौ रुपए का नोट शकीला को देते हुए कहा, “यह लो। एक सौ रुपए। गुड सयारा, वैरी गुड।”



क्लासरूम में तालियां बजने लगीं। अगल-बगल की क्लास के बच्चे भी वहां आ गए। सब सयारा की ही बात कर रहे थे। दूसरे ही

क्षण तालियों की आवाज बढ़ने लगी। सयारा की कुछ सहेलियों ने उसे कंधों पर उठा लिया। सब चिल्लाने लगे, “सयारा... सयारा।”

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